गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

वो रात

डॉ.हरिवंश राय  बच्चन की एक कविता जो मुझे बेहद पसंद है,इस प्रकार है-
                रात आधी खींच कर मेरी हथेली,
                एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने
                एक बिजली सी  छू गयी  सहसा जगा मैं,
                कृशन पक्षी  चाँद निकला था गगन में,
                इस तरह करवट पड़ी थी की तुम की
                आंसू  बह रहे थे इस नयन से उस नयन में
                मैं लगा दूँ आग इस संसार मैं,
                है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर
                जानती हो उस समय क्या कर गुजरने के लिए
                कर दिया तैयार तुमने,
                  फ़िर न आया वक्त वैसा,
                फ़िर न मौका उस तरह का
                फ़िर न लौटा चाँद निर्मम,
                और  हवा का झोंका उस तरह का
                बुझ नही पाया अभी तक,उस समय जो
                रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने,
                रात आधी खिंच कर मेरी हथेली,
                एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने......

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

परिभाषा

किशोर अवस्था में कहीं एक कविता पढ़ी  थी जो प्रेम को परिभाषित करती है और  मेरे मन के बहुत करीब है,
मुस्कराहटों  के  मेले  में
खिलखिलाती हुई
जब तुम मिली मुझे पहली बार
तब उसी पल  से लगा
जीवन का सच तुम ही हो
तुम्हारे अधरों से निकली हंसी
बरबस मुझे भी कुछ ख़ुशी दे गई
ओर में समझ गया
"प्रेम" क्या होता  है.